हरिद्वार श्यामपुर
हरिद्वार वन प्रभाग के श्यामपुर रेंज में दो बाघों के शिकार मामले ने पूरे उत्तराखंड में सनसनी फैला दी है। अब इस हाईप्रोफाइल मामले में वन विभाग ने बड़ा एक्शन लेते हुए रेंज अधिकारी के साथ-साथ वन दरोगा और फॉरेस्ट गार्ड को भी निलंबित कर दिया है। विभाग की इस कार्रवाई के बाद जंगल महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।
बताया जा रहा है कि श्यामपुर रेंज के सजनपुर बीट क्षेत्र में दो बाघों की संदिग्ध मौत के बाद जब जांच शुरू हुई तो मामला सीधे शिकार से जुड़ा निकला। शुरुआती जांच में सामने आया कि शिकारियों ने बाघों को जहर देकर मौत के घाट उतारा और बाद में उनके पंजे काटकर फरार हो गए। इस खुलासे ने वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी।मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रमुख वन संरक्षक कार्यालय ने श्यामपुर रेंज के रेंजर विनय कुमार राठी, संबंधित वन दरोगा और फॉरेस्ट गार्ड को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि क्षेत्र में गश्त और निगरानी व्यवस्था में भारी लापरवाही सामने आई है, जिसके चलते शिकारी जंगल में सक्रिय रहे और विभाग को भनक तक नहीं लगी।इस कार्रवाई के बाद हरिद्वार से देहरादून तक वन विभाग में अफरा-तफरी का माहौल है। क्योंकि बीते कई महीनों से हरिद्वार वन प्रभाग लगातार विवादों में घिरा रहा है। कभी हाथियों की मौत, कभी नीलगाय का प्रकरण मामला,कभी सांपों के जहर की तस्करी और अब बाघों का शिकार… इन घटनाओं ने वन्यजीव सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी NTCA भी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है और जल्द टीम उत्तराखंड पहुंच सकती है। खास बात यह है कि अब तक बाघों के काटे गए पंजे बरामद नहीं हो पाए हैं, जिससे वन्यजीव तस्करी के बड़े नेटवर्क की आशंका भी जताई जा रही है।वहीं वन विभाग के अंदर यह चर्चा भी तेज हो गई है कि इस मामले में आगे और बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है। विभाग अब पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार कर रहा है।आने वाले महाकुंभ से पहले इस घटना ने सरकार और वन विभाग दोनों की चिंता बढ़ा दी है। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ वाले क्षेत्र में यदि जंगल सुरक्षित नहीं हैं तो यह आने वाले समय के लिए बड़ा खतरे का संकेत माना जा रहा है।फिलहाल जंगल के रखवालों पर हुई कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि सरकार इस मामले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। लेकिन सवाल अब भी वही है… आखिर शिकारी जंगल में इतने दिन तक सक्रिय कैसे रहे और विभाग को भनक तक क्यों नहीं लगी?
