हरिद्वार
श्यामपुर रेंज में बाघ शावकों की मौत का मामला अब केवल वन्यजीव मृत्यु तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरा प्रकरण वन विभाग की कार्यशैली, जवाबदेही और अंदरूनी संरक्षण पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। विभाग ने चार लोगों को जेल भेजकर कार्रवाई का दावा तो कर दिया, लेकिन सबसे अहम सवाल आज भी अनुत्तरित हैं—मृत शावकों के काटकर ले जाए गए पंजे आखिर कहां हैं? और उनकी मां बाघिन अब तक क्यों नहीं मिली?यदि वन विभाग के अनुसार आरोपी पकड़े जा चुके हैं, तो फिर वन्यजीव तस्करी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सबूत बरामद क्यों नहीं हुआ? यही कारण है कि अब इस कार्रवाई को लेकर क्षेत्र में संदेह पैदा होने लगा है। चर्चाएं हैं कि कहीं पूरे मामले में केवल निचले स्तर के लोगों को जेल भेजकर विभाग अपने अधिकारियों की जिम्मेदारी छिपाने की कोशिश तो नहीं कर रहा।
इस पूरे मामले में बिट अधिकारी, सेक्शन अधिकारी और रेंज स्तर के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सूत्र बताते हैं कि जिस बीट में यह घटना हुई, वहां तैनात वन आरक्षी को रेंजर का बेहद करीबी माना जाता है। यही नहीं, यह भी चर्चा में है कि उक्त वन आरक्षी पहले भी रुड़की रेंज में रेंजर की तैनाती के दौरान दो बार निलंबित हो चुका है, लेकिन हर बार कार्रवाई छोटे कर्मचारियों तक सीमित रही और अधिकारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
रेंजर की कार्यप्रणाली को लेकर पहले भी कई विवाद सामने आते रहे हैं। PFA की शिकायत के बाद बिना लाइसेंस संचालित एक वेनम सेंटर पकड़ा गया था, जहां से करीब 86 सांप बरामद हुए थे। आरोप लगे कि वहां रखे गए वेनम का पूरा हिसाब विभाग नहीं दिखा पाया। वहीं एक अन्य मामले में अजगर के शव को पहले दफनाया गया और बाद में शिकायत के बाद कब्र से निकलवाकर पोस्टमार्टम कराया गया।इसके अलावा एक नीलगाय के शव को बिना पोस्टमार्टम और बिना उच्चाधिकारियों को सूचना दिए दफनाने का मामला भी सुर्खियों में रहा। मीडिया में मामला सामने आने के लगभग 20 दिन बाद पोस्टमार्टम कराया गया। इन लगातार सामने आते मामलों के बावजूद संबंधित अधिकारियों पर कोई बड़ी विभागीय कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े कर रहा है।

सूत्रों की मानें तो प्रमुख वन संरक्षक ने पूरे मामले में DFO हरिद्वार से रिपोर्ट तलब की है। हालांकि विभाग के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि रेंज स्तर के अधिकारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। यही वजह है कि इतने संवेदनशील वन्यजीव प्रकरण में अब तक न तो संबंधित रेंजर को हटाया गया और न ही मौके पर तैनात पूरे स्टाफ को निलंबित किया गया।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक के बाद एक वन्यजीव मामलों में लापरवाही के आरोप सामने आ रहे हैं, तब भी जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या विभाग केवल वन आरक्षी और वन दरोगा पर कार्रवाई कर पूरे मामले की लीपापोती करेगा, या फिर इस बार जिम्मेदारी बीट से लेकर रेंज और डिवीजन स्तर तक तय होगी?
फिलहाल शावकों के गायब पंजे, लापता बाघिन और विभागीय चुप्पी ने पूरे मामले को और ज्यादा रहस्यमय बना दिया है। अब निगाहें सरकार और वन विभाग पर टिकी हैं कि वन्यजीवों की मौत पर सच सामने आएगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
