हरिद्वार
पंजाब पुलिस और ड्रग कंट्रोल विभाग की टीम ने हरिद्वार के पुहाना औद्योगिक क्षेत्र स्थित लुसेंट बायोटेक लिमिटेड पर छापा मारकर 325 किलो ट्रामाडोल जब्त किया। ये वही दवा है जो नारकोटिक कैटेगरी में आती है और इसकी हर खेप की निगरानी कानूनन जरूरी है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड का ड्रग कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है? ड्रग इंस्पेक्टर अनीता भारती और उनकी टीम को क्या ये मालूम नहीं था कि उनके इलाके में नशीली दवाओं की बड़ी फैक्ट्री चल रही है?
पंजाब ने संभाला मोर्चा, उत्तराखंड रहा खामोश
अमृतसर में जब ट्रामाडोल की अवैध खेप पकड़ी गई, तभी पंजाब की टीम ने इसकी जड़ तलाशनी शुरू की। जांच की कड़ियां हरिद्वार तक पहुंचीं। पंजाब से आई ड्रग कंट्रोल टीम और पुलिस ने ट्रक लेकर हरिद्वार में रेड डाली, और जो सामने आया, वो चौंकाने वाला था।
13 ड्रम में तैयार की जा रही थीं लाखों ट्रामाडोल टैबलेट्स। फर्जी कंपनी के नाम पर उत्पादन हो रहा था, सप्लाई हो चुकी थी। और हरिद्वार ड्रग इंस्पेक्टर…? चुप्पी साधे बैठी रही।
फैक्ट्री वैध, पर थर्ड पार्टी फर्जी- और फिर भी लाइसेंस जारी?
लुसेंट बायोटेक के पास मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस था, लेकिन उत्पादन फर्जी कंपनी “कोनानड्रम फार्मास्युटिकल्स” के नाम पर हो रहा था, जो कागज़ों में भी नहीं मिली।
अब बड़ा सवाल
क्या हरिद्वार के ड्रग इंस्पेक्टर ने थर्ड पार्टी मैन्युफैक्चरिंग की कोई जांच नहीं की थी?
क्या यह सारा खेल स्थानीय अधिकारियों की अनदेखी या मिलीभगत से चल रहा था?
NDPS एक्ट लगा, गिरफ्तारी भी हुई — लेकिन निगरानी कहां थी?
फैक्ट्री हेड हरीकिशोर को गिरफ्तार कर लिया गया है। विक्रम सैनी से पूछताछ हो रही है, आर्यन पंत फरार है। रिकॉर्ड अधूरे, GMP की धज्जियां उड़ाई गईं, और दस्तावेज़? नदारद।
हरिद्वार ड्रग इंस्पेक्टर की ज़िम्मेदारी थी कि वह हर उस उत्पादन इकाई की निगरानी करे जहां नारकोटिक दवाएं बन रही हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अगर पंजाब टीम ना आती, तो यह कारोबार चलता रहता!
हरिद्वार के अधिकारियों ने न तो समय रहते जांच की, न कोई रेड डाली। यदि पंजाब की टीम सक्रिय न होती, तो ये नशीली दवाएं बाजार में पहुंच चुकी होतीं — और शायद अगली खेप की तैयारी भी चल रही होती।
अब जवाब चाहिए:
थर्ड पार्टी मैन्युफैक्चरिंग के नाम पर फर्जी कंपनी को क्लीन चिट किसने दी?
हरिद्वार में ड्रग इंस्पेक्शन की क्या नीति है? सिर्फ कागजों तक सीमित?
ड्रग कंट्रोल विभाग कहां था जब ये 325 किलो की खेप बन रही थी?
यह लापरवाही नहीं, अपराध के बराबर है।
यह मामला सिर्फ एक छापेमारी नहीं, यह उत्तराखंड औषधि विभाग के सिस्टम पर एक करारा तमाचा है। यह दिखाता है कि जवाबदेही के अभाव में कैसे नशीली दवाओं का सिंडिकेट फल-फूल रहा है।
अब देखना है कि इस घोटाले के बाद भी ड्रग कंट्रोल विभाग आंखें मूंदे रखेगा या कुछ ठोस कार्रवाई होगी।
